माँ

माँ को देखता हूँ
शरीर झुक गया हैं
वो पीठ जो मुझे उठा कर पुरे घर की सैर कराती थी
आज अपने ही वजन से चार कदम में थक जाती हैं
माँ को देखता हूँ
मुझे देख आज भी
पुछती हैं, उसी प्रेम से, “बेटे भुख लगी है, कुछ बना दुँ !”
आज भी माँ को याद है, मेरी पसंद , मेरी नापसंद