I wanted to meet him

I wanted to meet him
Sit with him
With his eyes closed
With my eyes closed
With only the sound of heartbeat…

I wanted to meet him
Fill his fragrance in my heart
Feel the ocean of silence inside him
Immerse myself a little more…

Alas! he has send the message
Through the airs
He is going home
No more meetings for him..
Not now…

My heart is filled with tears
Are they of pain, I doubt
Are they of joy, I doubt
But,
I know
I will meet him
Because, I too will go home one day…
_/_

Dunija Rothschild

बांसुरी और वह

राह में  मिले कृष्णा कहीं, मुझे
अपनी  बांसुरी दे गए
कान में मेरे चुपके से
एक बात कह गए —
वह छेल छबीली पनघट पर
शिथिल , चुपचाप खड़ी है
वह जड़ है
लेकर अपना भार खड़ी है
अपने प्रिय की प्रतीक्षा में
कितनी लाचार बनी है
आँखों में, अंतर में, कुछ लिए
वह बेजार खड़ी है
– अपूर्व ! तुम उसे
यह बांसुरी दे देना
उसकी अनकही बातों को
उसके प्रिये तक पहुंचा देना

मै फिर पहुंचा पनघट पर
हाथ में बांसुरी लिए
संकुचता हुआ
ह्रदय  में संवेदना लिए
लगा जैसे एक भोली बाला
लाज में गड़ी हो
प्रेम की आग दिल में लिए
संशय में पड़ी हो
दे दूँ उसे बांसुरी
और खोल दूँ वो सब द्वार
जिन्हे वो यत्न  से, सब से छुपा, बंद किये खड़ी है
या
उसे ऐसे ही देखता रहूं
उसके मूक सुख को
मैं भी अनुभव कर जी रहूं

—- अपूर्व मोहन

Life

Author: Dunija Rothschild

Life a great teacher
holds my hand every morning
teaches me to laugh in pain
and cry when filled with joy…
Life a great teacher
whispers songs of love, of hope
in my ears
and teach world is but a giant toy… 

About the Author:
Dunija Rothschild, is a writer, meditator and philosopher.  She enjoys observing herself and others in the varied colors of life. All her stories and poems take shape from the class called Life, they are inspired from the real life incidents.

अन्दर कोई हैं

गाड़ियों में जाने-अनजाने आदमी भागते जा रहे हैं….
मैं भी भाग रहा हूँ, तेज बहुत तेज…
अन्दर कोई हैं जो कह रहा हैं- भाग ले कितना भी तेज मंजिल नहीं मिलेगी…

दोस्तों के घर सजे हैं सुन्दर नियाब चीजों से…
मैं भी सजा रहा हूँ घर, चीजे ढूंढ ढूंढ…
पर कोई हैं जो हँस रहा हैं- घर सुन्दर सजाने से तू तो सुन्दर नहीं होगा…

मेरे साथी सम्बन्धी भर रहे हैं तिजोरियां…
मैं भी जुटा हूँ पैसे कमाने में…
पर पा रहा हूँ अन्दर अब भी खाली हूँ…

-प्रेम

प्रभु तुम बरस रहे हो…

प्रभु तुम बरस रहे हो…
हर पल हर क्षण…
पर जाने क्यों मेरा ह्रदय आँगन सुखा ही रह जाता हैं..,

आस-पास जहाँ भी ह्रदय से देखता हूँ…
प्रभु तुम ही नज़र आते हो…
पर जाने क्यों इन आँखों में तुन्हारी छवि धूमिल होती जाती हैं…

जब भी तुम्हारे प्रेम के लिए हाथ फहलाता हूँ…
मेरी साँसे तुम से महक पड़ती हैं…
पर हथेली से रेत की तरह तुम छुटते जाते हो….

प्रभु जानता हूँ, मुझमे ही कमी हैं…
पर जाने क्यों प्र्यतन कर के भी सुधार नहीं पाता…

– प्रेम

प्रेम का दीप

अँधेरे को जो चीर रहा हैं…..

       प्रिय ये तुम्हारे प्रेम का ही दीप हैं…..
उस पल जब डर से घिर, मेरा ह्रदय कपने लगता हैं….
         साँसे भी डर के, मुझे छोड़ भाग जाना चाहती हैं…
                 तब इसकी न भुजने वाली लो कहती हैं…
                          हिम्मत मत हरो…. मैं साथ हूँ….
और कभी जब मैं उलझ जाती हूँ संसार की बातों में….
         भटक जाती हूँ अपनी राह,
                  तब इसकी रोशनी मुझे मार्ग देती हैं…
                          प्रभु वापस तुम तक आने का….

अँधेरे को जो चीर रहा हैं…..

       प्रिय ये तुम्हारे प्रेम का ही दीप हैं…..
– प्रेम

व्यापार

हर रोज सुबह उठ कर मैं ठेली लगाता हूँ….
व्यापार करता हूं
सपनों में जीने वालो को जगाता हूँ ॥
झकझोडता हूँ !! जमीन में गहरी जडों को खोदता हूँ ।।
तुम्हे यथार्थ दिखाना चाहता हूं …. !!

सच बोलता हूँ अौर सच बोलने का अपराध सिखाता हूं
हर किसी को अपना सच का दर्पन बेचना चाहता हूं ….!!
झुठ के तुम्हारे सुन्दर कपडो को जला कर
तुम्हे अपनी तरह नग्न खडा कर देना  चाहता हूं …. !!

हां जानता हूं मुझे तुम फिर सूली दोगे
फिर भेजोगे विष का प्याला
यही मूल्य तुम दे सकोगे ….!!
और इसी को पाकर मैं खुश हूं ….!!
हाँ मैं व्यापार करता हूं
और तुम्हें अपना ग्राहक बनाना चाहता हूं

प्रेम _/_

माँ

माँ को देखता हूँ
शरीर झुक गया हैं
वो पीठ जो मुझे उठा कर पुरे घर की सैर कराती थी
आज अपने ही वजन से चार कदम में थक जाती हैं
माँ को देखता हूँ
मुझे देख आज भी
पुछती हैं, उसी प्रेम से, “बेटे भुख लगी है, कुछ बना दुँ !”
आज भी माँ को याद है, मेरी पसंद , मेरी नापसंद